शनिवार, 17 सितंबर 2011

ब्रह्मचर्य की परिभाषाएँ...


परिभाषा हालाँकि हर चीज़ को नहीं बाँध पाती, परन्तु फिर भी दी जाती है। भले ही कभी-कभी नेति नेति (इतना काफी नहीं, इतना काफी नहीं) करके देनी पड़े। ब्रह्मचर्य भी कुछ-कुछ ऐसा विचार है। लेकिन फिर भी इसकी प्रामाणिक परिभाषाएँ उपलब्ध हैं
यह एक महान् भाव है और इसलिए उदात्त भावों की तरह अवर्णनीय है। लेकिन इस बात को इस बहाने की तरह प्रयोग नहीं किया जा सकता कि "हमारी संस्कृति में इसकी परिभाषा स्पष्ट नहीं है" या "इसको स्पष्ट नहीं किया गया है"। इसका अवर्णनीय होना इसके प्रामाणिक होने में बाधक नहीं है। इस लेख में हम ब्रह्मचर्य की परिभाषाओं और उन परिभाषाओं के अन्तस् को देखने का प्रयास करते हैं -
प्राचीन ग्रन्थों में पवित्र डुबकी लगाने से पहले हम संस्कृत के एक प्रामाणिक शब्दकोश में झाँकते हैं। संस्कृत का एक मशहूर शब्दकोश है श्री वामन शिवराम आप्टे का शब्दकोश यह कोश निम्नलिखित अर्थ देता है -


ब्रह्मचर्यम्= 
1.धार्मिक शिष्यवृत्ति, वेदाध्ययन के समय ब्राह्मण बालक का ब्रह्मचर्य जीवन, जीवन का प्रथम आश्रम;
2. धार्मिक अध्ययन, आत्मसंयम;
3. कौमार्य, सतीत्व, विरति, इन्द्रियनिग्रह
[वहीं साथ ही यह कोश एक और शब्द देता है: ]
ब्रह्मचर्या= सतीत्व, कौमार्य

हम देखते हैं कि इनमें से जो-जो अंश गहरे अक्षरों में हैं ब्रह्मचर्य का वह अर्थ स्पष्टतः देते हैं जिसके बारे में जानने के लिए हम लालायित हैं। क्योंकि ब्रह्मचर्य का एक अर्थ तो ब्रह्मचर्य आश्रम (यानी जीवन का पहला विद्यार्थीपन वाला भाग) है ही, लेकिन इसका व्यापक अर्थ कौमार्य, सतीत्व या इन्द्रियनिग्रह भी है इसमें कोई शक नहीं रह जाता। यहाँ शब्दकोश का सन्दर्भ पहले इसलिए दिया गया है, क्योंकि आगे  के उद्धरणों (citations) में जब ब्रह्मचर्य शब्द आयेगा तो उसके अभिप्राय में कोई सन्देह नहीं बचना चाहिये। हालाँकि हमारी अन्वेषणात्मक दृष्टि आगे भी कायम रहेगी लेकिन शब्दकोश का भी महत्त्व है, क्योंकि ये प्राचीन ग्रन्थों के प्रयोगों का बहुकोणीय अध्ययन करने के बाद ही एक-एक अर्थ देते हैं। हम देखते हैं कि प्राचीन महापुरुषों ने ब्रह्मचर्य और ब्रह्मचर्या शब्दों का प्रयोग इस अवधारणा पर लिखते हुए प्रचुर रूप से किया है। और इसीलिए यहाँ हमने यहाँ 'ब्रह्मचर्य' का कोशकार की दृष्टि में अर्थ दिया है। (यह लेख अभी जारी है...ब्लॉग का प्रथम लेख पढ़ने के लिए ब्रह्मचर्यं नमस्कृत्य चासाध्यं साधयाम्यहम्... पर क्लिक करें।... विज्ञ पाठकों से निवेदन है कि ब्लॉग पर अपने सुझाव/प्रतिक्रियाएँ निस्संकोच दें, ताकि वे आगे के लेखों के लिए उपयोगी हो सकें। धन्यवाद।)

5 टिप्‍पणियां:

  1. श्रीमान हेमंत जी,
    आपके इस जागृति मिशन में हमेशा साथ रहूँगा. जहाँ भी कुछ अनुचित लगेगा प्रश्न करूँगा. आपने प्रचलन से हटकर विषय लिया है.. और इसके लिये आपको बधाई देता हूँ.. विद्यार्थीभाव से आप अपने मिशन को लेकर बढ़ेंगे तो कामयाबी अवश्य मिलेगी..

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  2. धन्यवाद प्रतुल जी। आपने बिल्कुल सही कहा, यह विषय प्रचलन से हटकर है।...शब्द के प्रचलित अर्थ में तो मैं विद्यार्थी नहीं हूँ, लेकिन विद्या-प्राप्ति के भाव के अर्थ में मैं विद्यार्थी ही हूँ, अतः आपकी बात युक्त है। आपकी शुभकामनाओं के लिए हार्दिक आभार।

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  3. मुझे यानी हम युवाओँ को सही दिशा देने के लिए


    धन्यावाद

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  4. bahut bahut dhanayabad bramcharya ke subject par jankari dene ke liye...

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