बुधवार, 16 मई 2012

(युवाओं को चाहिये कि) समझने की प्रक्रिया को एक्सलरेट करें...

ब्रह्मचर्य से या अपने प्रबलतम कामावेग को संयत रखने से कोई फायदा होता है यह बात समझने के लोगों के अपने अपने लेवल होते हैं। ये लेवल व्यक्ति के मानसिक-उच्चता के स्तर पर भी निर्भर करते हैं और उम्र पर भी। ये दोनों कारक स्वतन्त्र रूप से कार्य कर सकते हैं।
उम्र की बात की जाये तो ब्रह्मचर्य से फायदा होता  है यह बात सबसे नयी उम्र के लोग हो सकता है सबसे कठिनता से समझें, उसके बाद थोड़े बड़े युवाओं में यह प्रतिशत बढ़ जाता है, क्योंकि अपनी गलतियों और अनुभव से लोग काफी शिक्षा लेते हैं (इसमें कुछ गलत भी नहीं है)। तीस वर्ष के आसपास शायद लोग सबसे ज्यादा आसानी से इस बात को समझ सकते हैं। आगे तो यह समझ बढ़ती ही है। और इस बात से हम अनभिज्ञ नहीं हैं कि सबसे बुज़ुर्ग लोग सबसे ज्यादा कन्विन्स्ड (convinced) होते हैं कि संयम रखने वाले युवक ही सबसे तेजी से आगे बढ़ सकते हैं।
इस सारी उम्रवार समझ का कारण यह है कि व्यक्ति जीवन जीते-जीते खुद की घटनाओं के द्वारा और साथ ही लोगों के संपर्क में आते हुए अधिकाधिक मामलों ( cases ) के संपर्क में आते-आते कई सारी चीजें प्रत्यक्ष सिद्ध कर लेता है, जिनपर कि केवल कहने मात्र से या पढ़ने मात्र से यकीन नहीं होता।

लेकिन हम यहाँ कहना चाहते हैं कि जितनी जल्दी इस बात को समझा जाये मनुष्य उतने प्रबल व्यक्तित्व का धनी बन सकता है। कारण सीधा है। मान लीजिये किसी को तीस वर्ष की उम्र में यह बात समझ में आती है, यदि मनुष्य की सामान्य आयु 70 वर्ष मानी जाये तब उसके पास जीवन के चालीस वर्ष ही हैं, जिनमें से भी विद्यार्थी जीवन शायद निकल चुका है। लेकिन जो व्यक्ति बाईस वर्ष की उम्र में इस तथ्य से कन्विन्स्ड् या सन्देहरहित (convinced ) हो गया है उसके पास आठ वर्ष अधिक हैं जो कि युवावस्था के स्वर्णिम वर्ष हैं जिनमें कि वह अपनी प्रबल ऊर्जा को पढ़ाई या खेल (या दोनों) में लगाकर अपना व्यक्तित्व हमेशा-हमेशा के लिए प्रखर बना सकता है। (इसका अर्थ यह न लें कि तीस वर्ष की उम्र में जागे तो जागे नहीं... जनाब यहाँ तो जागना ही बहुत बड़ी बात है)। इसका मतलब यह है कि युवाओं को अपनी समझने की इस प्रक्रिया को तेज करना चाहिये,... एक्सलरेट (accelerate) करना चाहिये।

यह कैसे संभव है? क्या मैं मेरी समझ को नियन्त्रित रख सकता हूँ। क्या जो चीज मुझे वैचारिक-रूप से आज की उम्र में  (हार्मोनों के कारण) अपाच्य है, उसे मैं आज ही सुपाच्य बना सकता हूँ? क्या मैं अपनी समझ को आदेश देकर कह सकता हूँ कि तू जल्दी विकसित हो जा ! ?
जी हाँ, यह संभव है। आप अच्छी तरह जानते हैं कि समझ नाम की चीज हमारे अंदर बहुत कुछ आसपास के वातावरण से विकसित होती है। जैसे आप अपने चारों ओर देखिये। महानगरों के चौराहों पर आठ-नौ वर्ष के बच्चे वाहन रुकते ही हाथ फैलाकर पैसे माँगने लग जाते हैं। आप याद कीजिये कि जब आप आठ नौ वर्ष के थे आपको कोई ऐसा करने को कहता तो आप शरमा जाते। क्योंकि आपके आसपास के वातावरण यानी घर परिवार में भीख माँगना बहुत निम्न कार्य माना जाता था अतः आपकी समझ भी यही बनी। यदि ये ही अभागे बच्चे किसी ठीक-ठाक परिवार में पले बढ़े होते (भले ही जन्मे कहीं और होते) तो इन्हें भी इस कार्य में शर्म महसूस होती।
इसी तरह हर मामले में आसपास का वैचारिक वातावरण असर डालता है। यदि मैं सारा दिन ऐसी पुस्तकें पढ़ता रहूँ जिनमें नायक नायिका शारीरिक सुखभोगों के लिए सारे संवाद बोलते और सारा जीवन जीते हों तो मुझे कौनसे विचार आयेंगे? यदि मैं दिन में एक फिल्म भी ऐसी देखता हूँ जिसमें के समाज को कोई शक नहीं है कि शारीरिक इच्छा की पूर्ति ही कहानी का सुखान्त है, तो मेरे मन में कौनसे आकर्षण आयेंगे? कहने का मतलब यह नहीं कि समाज से अपने को काट डालो। लेकिन समझ रखो कि किस चीज का असर क्या है। अगर यह समझ आपमें है तो आप कुछ तो आगे बढ़ चुके होंगे। आगे का काम आसान हो जायेगा।

इन चीजों से बचने के साथ ही मेरे विचार से इसके लिए आपको ब्रह्मचर्य से संबंधित पुस्तकें बार बार पढ़ते रहना चाहिये। इसका असर अपने आप होता है। ऐसी पुस्तकें या लेख बार-बार पढ़ने से कुछ दिनों में ऐसा लगने लगता है कि ब्रह्मचर्य ही सबसे ज्यादा प्रशंसित गुण है (मैं यहाँ लगने लगता है इसलिए कह रहा हूँ कि आज के समाज में प्रशंसा तो इसकी कम हो गयी है, हालाँकि लाभ कम तो होने से रहे)। और मन उसी चीज को पाने का टार्गेट करता है जो चीज समाज में सबसे प्रशंसित हो (जैसे ऑर्कुट प्रशंसित हो तो ऑर्कुट, फेसबुक प्रशंसित हो तो फेसबुक), यह मन की स्वाभाविक वृत्ति है, आपको कुछ करना नहीं पड़ेगा। आपको सिर्फ ऐसी किताबें बार बार पढ़नी होंगी, अर्थ समझते हुए। एक बार आप ऐसे स्वाभाविक संयम के "चक्कर" में फँस गये तो आपको पढ़ाई और व्यक्तित्व में, कार्य की गुणवत्ता में, इतने लाभ होंगे कि यह आपका केवल "अंधविश्वास" नहीं रह जायेगा बल्कि अनुभव बन जायेगा। यानी आप इन तथ्यों से convinced जायेंगे। कुल मिलाकर, यह एक कार्य आपको कम उम्र में ही convinced कर देगा। आज नहीं तो कल हर मनुष्य की यह समझ विकसित होनी ही है, तो फिर क्यों न उसे जल्दी विकसित करके उसके प्रबलतम लाभ उठाये जायें ?


और यदि आप इस मैथड से कन्विन्स्ड् न हों तो मैं सिर्फ इतना कहूँगा कि कम से कम इस एक काम को तो बिना कन्विन्स्ड् हुए शुरू कर लीजिये। आगे तो कन्विन्स्ड् होना ही है।


बुधवार, 18 जनवरी 2012

ब्रह्मचर्य साधना और आधुनिक तकनीकी का उपयोग


पहला प्रश्न यह उठता है कि क्या ब्रह्मचर्य साधना के लिए उन्नत या आधुनिक तकनीकों का आश्रय लेने में कोई तुक है?
इस पर विचार कर लेते हैं।
किसी भी परीक्षा में सफल या असफल होना तो कई बातों पर निर्भर है (जिनमें शायद भाग्य भी एक है) लेकिन परीक्षा में सफलता के लिए कुछ साधनों का उपलब्ध होना तो बहुत जरूरी हैं। यह तो हम ऍडवान्स में ही जानते हैं कि अगर सफल नहीं हुए तो इसपर  सन्तोष कर लेंगे कि कम-से-कम हमने मेहनत तो की। लेकिन यदि आप मेहनत करने के साथ-साथ किन साधनों के साथ मेहनत करनी है, किन तकनीकों के साथ मेहनत करनी है, यह नहीं जानते तो आप अपनी मेहनत के साथ खुद ही अन्याय करते हैं। फिर आप असफल होने पर कह भी लीजिये कि मेहनत तो की, लेकिन यह लगभग पहले ही निश्चित था कि मेहनत का क्या होगा। क्या सही तकनीकों और साधनों को जुटाना मेहनत का अंग नहीं है? तो फिर उनकी उपेक्षा क्यों की जाये। क्या छात्र का पढ़ने के लिए टेबल की माँग करना अनुचित है? क्या बाँसुरी सीखने वाला अच्छी क्वालिटी की बाँसुरी (भले ही वह थोड़ी मँहगी हो) के बिना सुर की बारीकियाँ सीख सकता है?  तो फिर ब्रह्मचर्य जैसी महान् परीक्षा के लिए बाहरी साधनों की उपेक्षा कैसे कर दी जाये? इसलिए हम यहाँ बतायेंगे कि ब्रह्मचर्य के लिए किन किन आधुनिक तकनीकों का उपयोग किया जा सकता है।

गूगल डाक्युमेन्ट्स - गूगल डॉक्युमेन्ट्स आपको सर्वत्र उपलब्ध माइक्रोसॉफ़्ट वर्ड (Microsoft Word) के समान सुविधा देता है (हालाँकि इसके लिए इन्टरनेट उपलब्ध होना जरूरी है)। और इसीलिए अपने ब्रह्मचर्य से सम्बन्धित अनुभवों को आप गूगल डॉक्युमेन्ट्स में यथासमय दर्ज करते रह सकते हैं। दरअसल कॉपी-पेन से ऐसे अनुभव लिखने से हम अपनी निजता को खतरा महसूस कर सकते हैं। जो गूगल डॉक्युमेन्ट्स में काफ़ी कम है, अपने ऍकाउन्ट को हम खुद ही ऍक्सेस करते हैं। लेकिन फिर भी अपने विचारों को सन्तुलित भाषा में दर्ज करना स्वयं के भी हित में है।

मोबाइल फ़ोन पर रिमाइन्डर - यदि हम जानते हैं कि किसी समय विशेष पर हमारे संकल्प डिगने लगते हैं, तो प्रातःकाल (प्रायः यही समय सबसे सात्त्विक अनुभव का होता है) मोबाइल फ़ोन पर उस समय का रिमाइन्डर लगाकर अपना सर्वश्रेष्ठ संकल्प दर्ज कर सकते हैं, जिससे समय रहते हमें अपना संकल्प पुनः स्मरण हो जाये। और हाँ, ऐसा रिमाइन्डर ऐसी भाषा में दर्ज करें जो आपके मन-मस्तिष्क को सबसे ज्यादा छूती हो।

कम्प्यूटर - अपने कम्प्यूटर के वॉलपेपर पर ऐसा चित्र लगायें जिसे देखते ही ब्रह्मचर्य की ओर सहज वृत्ति जाग्रत हो। आप किसी महापुरुष का चित्र लगा सकते हैं।
इन्टरनेट पर अनुचित सामग्री देखने की वृत्ति से बचने के लिए भी यह उपाय सहायक होता है। कुछ लोग अपने परिवार के सदस्यों का फ़ोटोग्राफ़ वॉलपेपर के रूप में लगाकर भी इस बुराई से दूर रह पाते हैं।
कम्प्यूटर में आप ब्रह्मचर्य के विचारों को एक साथ संग्रह करके भी रख सकते हैं और उन्हें प्रतिदिन पढ़ने से ब्रह्मचर्य की वृत्ति का विकास होता रहता है। जिस दिन आपको इन्टरनेट उपलब्ध न हो सके (यानी जब भूमध्य सागर में तार टूट जाये :) ) और आप नेट पर ब्रह्मचर्य विषयक सामग्री पढ़ने में अक्षम हों, तब आप ऐसे संगृहीत विचारों का उपयोग कर सकते हैं।

टी.व्ही./प्लेयर पर भजन/प्रेरक गीत सुनना - यह तकनीकी तो इतना आम है कि इसे आधुनिक तकनीक की श्रेणी में गिनना भी मुश्किल लगता है। इससे भी आत्मोद्धार होता ही है। हमारे यहाँ यह सर्वमान्य है कि सद्वाक्य चाहे जैसे भी कानों में पड़ें आखिर भला ही करते हैं।
यदि इस प्रकार भजन सुनकर हम अपने आप को अधोगामी वृत्तियों से बचा पाते हैं तो इससे बड़ा लाभ क्या होगा। मन को कहीं तो आश्रय चाहिये, यदि भजनों इत्यादि में आश्रय दे दिया जाये तो मन को गलत जगह जाने का खाली समय ही नहीं मिलेगा। प्रेरक गीतों को सुनने से आत्मबल भी बढ़ेगा।

इसी प्रकार जो भी उन्नत या आधुनिक तकनीकें ब्रह्मचर्य एवं संयम के पालन में सहायक हो सकती हों उनका उपयोग किया जा सकता है। याद रखें, तकनीकी तो तटस्थ (न्यूट्रल्) है, उसका सदुपयोग या दुरुपयोग व्यक्ति पर निर्भर है। अतः तकनीकों का सदुपयोग करके हम उन तकनीकों से श्रेष्ठतम लाभ भी प्राप्त कर पायेंगे।

॥ शुभकामनाओं सहित 

रविवार, 16 अक्टूबर 2011

क्या ब्रह्मचर्य से डिप्रेशन होता है?

यह प्रश्न अक्सर पूछा जाता है। यह बड़ा ही उलझाऊ प्रश्न है। इसे अंग्रेज़ी में लोडेड क्वेश्चन (loaded question) कहा जा सकता है। इसका उत्तर सीधे हाँ या नहीं में दे देने से कुछ मतलब नहीं निकलने वाला। इसके लिए पूरी बात लिखनी होगी।
जबर्दस्ती अपनी प्रबल इच्छाओं को दबाने से कुछ लोग जरूर डिप्रेशन का अनुभव करते हैं। लेकिन उन इच्छाओं को खुला लायसेन्स दे देने से भी कोई कल्याण होता नहीं देखा गया है। यह सामान्य अनुभव की बात है।
अपने ऊपर कोई संकल्प-रूपी प्रतिबन्ध न लगाने वाले छात्र अक्सर ही अपने मन के कारण परेशान देखे जाते हैं। और वे अपने पढ़ाई में मन न लगने या यथेष्ट मात्रा में मन न लगने का प्रमुख कारण, प्रायः अपने उन विषयों में घूमते रहने वाले मन को बताते हैं- इसी तथ्य से यह पता चलता है कि वे भी वास्तव में अपने आप को छूट देने के बाद भी सन्तुष्ट नहीं हैं। ऐसे में विवेकानन्द का यह कथन याद आ जाता है, जिसमें वे कन्फ़्यूशियस (एक चीनी दार्शनिक) के एक प्रसिद्ध कथन पर प्रतिक्रिया देते हैं। वे कहते हैं कि- कन्फ़्यूशियस ने कहा कि परलोक की चिन्ता करने से पहले हमें अपने इस लोक को ठीक से सँवारना होगा। लोग परलोक की चिन्ता करते करते परलोक तो पाते हैं या नहीं लेकिन अपना यह लोक बिगाड़ बैठते हैं। लेकिन हम कहते हैं कि परलोक की चिन्ता करने से तो यह लोक बिगड़े न बिगड़े, लेकिन हम इतना जरूर जानते हैं कि इस मायाजाल रूपी इहलोक को सँवारने के लिए अगर इसमें उलझा जाये तब तो यह लोक जरूर बिगड़ जाता है। [हो सकता है कि मेरे शब्दों में कुछ हेरफ़ेर हो गया हो लेकिन भाव यही है।] 
कहने का मतलब यह है कि ब्रह्मचर्य के मामले में भी ठीक यही बात लागू होती है। ब्रह्मचर्य से हो सकता है कि अल्पकालीन डिप्रेशन हो, लेकिन अब्रह्मचर्य से, विषयों के पीछे दौड़ने का खुद को खुला लायसेन्स दे देने से- जो जीवन अनियन्त्रित होगा, उससे विद्यार्थियों की पढ़ाई की जो हानि होती है, उससे काम्य के न मिलने से जो विषाद होता है- इन सबसे तो डिप्रेशन होना निश्चित है। इन कारणों से जो डिप्रेशन होगा उनका कोई इलाज भी नहीं दिखता (जबकि ब्रह्मचर्य के उस अल्पकालीन डिप्रेशन का इलाज एक प्रकार से खुद ब्रह्मचर्य ही है)। आप किसी मनोवैज्ञानिक से भी पूछेंगे (कि मेरा पढ़ाई में मन नहीं लगता दूसरी किसी खास तरफ़ भागता है आदि) तो वे भी घूमफिरकर यही सलाह देंगे कि "बेटा उस ओर से मन हटाकर पढ़ाई में लगाओ शुरू में थोड़ी दिक्कत होगी बाद में मन उन चीज़ों को भूल जायेगा" (भले ही वे ही मनोवैज्ञानिक अवसर मिलने पर खुलेपन की पैरोकारी करते हों)- देखा जाये तो यह कोई जवाब न हुआ। यह तो वही बात हुई कि हमने कहा- "डॉक्टर साब मुझे बुखार हो गया है।" और डॉक्टर अपनी पर्ची पर कुल जमा यह प्रेस्क्रिप्शन लिखकर दे कि- "बुखार का इलाज करो"। लेकिन जो विद्यार्थी संयम को आदर्श के रूप में ही रखते हैं (निश्चय ही ऐसे लोग संख्या में बहुत कम होते हैं) उन्हें इस प्रकार की समस्या से निपटना आसान है, क्योंकि उनका मन ऐसी निश्चित मति वाला हो गया है कि कामोपभोग में सार नहीं है। जबकि पहली वाली कैटेगरी के लोगों को तो यह समझाना मुश्किल है कि आखिर क्यों कामोपभोग से दूर रहा जाये, केवल पढ़ाई के लिए? केवल कुछ अच्छे नम्बर लाने के लिए? केवल इसलिए कि हमारे ऊपर कुछ लोगों ने कुछ बोझा लादा हुआ है? क्या हम गधे हैं?.... और इस प्रकार हम देखते हैं कि ऐसे डिप्रेशन का इलाज नहीं ही दिखता। यदि कोई स्वल्प मात्रा में इसका इलाज कर भी पाता है तो वह अप्रत्यक्ष रूप से ब्रह्मचर्य के सिद्धान्तों को ही अपना रहा होता है।
ब्रह्मचर्य का पालन करने वाले जन, अपनी इच्छा के दमन से उत्पन्न डिप्रेशन को दूर करने के लिए प्रायः इन युक्तियों को सरल पाते हैं-

  •  ब्रह्मचर्य के लाभों को गिनवाने वाली कोई पुस्तक या महापुरुषों के ऐसे विचार पढ़ना। यह एक प्रभावी तरीका है। वस्तुतः  हम ब्रह्मचर्य धारण तभी कर पाते हैं जब हम संयम को तुच्छभोगों से अधिक लाभकर मान चुके होते हैं। यानी संयम की तरफ़ के पलड़े पर ज़्यादा वज़न रखे होते हैं।  वह पल जब हम वासना के साथ अन्तर्द्वन्द्व में होते हैं, तब हमारे दोनों पलड़े बराबर हो गये होते हैं, यानी हम यह अनुभव कर रहे होते हैं कि शायद वासना ही अधिक जरूरी है, या शायद हमें अपने संयम के संकल्प पर रहने से ज्यादा फायदा है।ऐसे में इन्द्रियाँ अपनी स्वाभाविक कमज़ोरी के कारण कभी भी वासना के पलड़े को भारी कर सकती हैं, लेकिन जैसे ही हम ऐसी लाभकर पुस्तक पढ़ते हैं, हमारे संयम वाले पलड़े पर वज़न पड़ जाता है और हम सहज ही बुराइयों से बच जाते हैं। और चूँकि अब की बार संयम की ओर वापस लौटने का निर्णय मन का सहज निर्णय होता है (ब्रह्मचर्य के लाभ याद करके) इसलिए हम डिप्रेशन से बच जाते हैं।
  •  ज़ोर-ज़ोर से किसी पवित्र मन्त्र का उच्चारण करना। यह भी एक प्रभावी तरीका है। क्योंकि मन्त्र सहज ही वातावरण को पवित्र कर देते हैं। यह कौन नहीं जानता कि वैदिक मन्त्रों का अर्थ समझ में न आने पर भी उनके उच्चारण की ध्वनि एक पवित्रता का संचार करती है। और खासकर गायत्री मन्त्र (देखें "ब्रह्मचर्य पर श्रीमद् भागवत का स्पष्ट कथन" पोस्ट) इस मामले में विशेष अनुशंसित है। ऐसा करने से मन तथा शरीर एक ओर व्यस्त हो जाते हैं- बलपूर्वक ही सही। ज़ोर-ज़ोर से मन्त्र बोलना एक प्रकार से ओजगुण का संचार करता है (काव्य में तीन गुण होते हैं- प्रसादगुण, माधुर्यगुण और ओजगुण, इनमें ओजगुण का संबंध वीरता से होता है)। और इसीलिए हम अपने लक्ष्य यानी ब्रह्मचर्य की ओर अधिक तत्परता से झुक जाते हैं।
  • संयम तोड़ने से होने वाली हानि व बुरे अनुभव के बारे में सोचना। ऐसी सोच हमारे डिप्रेशन का एक प्रकार का तोड़ है क्योंकि यह हमें एक अन्य डिप्रेशन की याद दिलाती है जो अपना रास्ता छोड़ने से हमें बाद में मिलेगा, और जिसका कोई तुरन्त इलाज भी हमारे हाथ में नहीं होगा, जबकि अभी के डिप्रेशन को तो हम केवल अच्छा सोचकर या किसी सृजनात्मक कार्य में मन लगाकर तुरन्त दूर कर सकते हैं।


इसलिए साररूप में हम कह सकते हैं कि ब्रह्मचर्य से डिप्रेशन होता हो यह केवल एक भ्रम है। हाँ, केवल अल्पकालीन डिप्रेशन का अनुभव हो सकता है, वह भी इसलिए कि हम असार में सार देखने लग जायें। लेकिन उसे दूर करने के भी तरीके हैं। यदि ठीक से अपनाये जायें तो न केवल डिप्रेशन तत्काल दूर होता है, बल्कि ब्रह्मचर्य के लाभ भी बढ़ जाते हैं।

॥ नमस्कार ॥

बुधवार, 28 सितंबर 2011

ब्रह्मचर्य पर श्रीमद् भागवत का स्पष्ट कथन...

ब्रह्मचर्य पर दुराग्रहों से ग्रस्त कुछ तथाकथित मनोवैज्ञानिक प्राचीन ग्रन्थों का भ्रामक हवाला देकर भी अपनी बात सिद्ध करने का प्रयास करते हैं। वे यह तो मानते हैं कि ब्रह्मचर्य की महिमा की गुणगान हमारे प्राचीन ग्रन्थों में किया गया है (क्योंकि यह तो प्रत्यक्ष सत्य है, इसका वे खंडन नहीं कर सकते) लेकिन अपना उल्लू सीधा करने के लिए ब्रह्मचर्य के अर्थ की जड़ें खोदना शुरू कर देते हैं। वे यह कहते हैं कि जिस ब्रह्मचर्य की बात वहाँ की जा रही है वह वीर्यरक्षा से सम्बन्धित न होकर कुछ और ही है। और आगे वही घिसे पिटे तर्क ... "ब्रह्मचर्य का अर्थ है ब्रह्म की खोज, इसका मतलब यह नहीं कि उसमें वीर्यरक्षण जरूरी हो"...वही घिसे पिटे जुमले... "ब्रह्मचर्य का अर्थ है ऐसी जीवनशैली जो ब्रह्म की ओर ले जाये यह जीवनशैली सहज है इसमें इन्द्रियनिग्रह की जरूरत नहीं"। दोस्तों इसके आगे हमें निरुत्तर हो जाना पड़ता है, क्योंकि यह एक ऐसा दावा है जो लगता है कि संस्कृत के ग्रन्थों की खूब खोल-पलट करने के बाद किया गया है। लेकिन क्या ऐसा सचमुच है? नहीं।


मैं जब सोलह सतरह वर्ष का था तब हमारे एक स्थानीय अखबार में एक "मनोवैज्ञानिक" शहर-भर की सारी समस्याएँ सुलझाने के लिए एक स्तम्भ लिखते थे। वे ज्यादातर समस्याओं को घुमा फिराकर मुक्त यौनसन्तुष्टि तक ले आते थे, और फिर जल्दी से अपना प्रिय विषय प्रतिपादित कर देते थे कि ब्रह्मचर्य का कन्सैप्ट ही भारत की सारी समस्याओं की जड़ है। अब सोचिये कि मेरे बालमन पर इसका कितना विलोडक प्रभाव पड़ता होगा।  वह तो ईश्वर की कृपा थी कि मुझे अपना खुद का अनुभव बार-बार यह अहसास करवाता रहा कि भाई आनन्द तो ब्रह्मचर्य की स्थिति में ही है। इसके अलावा भी छोटे-मोटे मनोवैज्ञानिक अखबारों में अपना मत रखकर ब्रह्मचर्य के खुद अर्थ पर ही प्रश्नचिह्न लगाते रहते थे। लेकिन हमारे धर्म के नियमों में तो अनुभव की छाप है, और ठीक इसीलिए मेरा भी अनुभव इससे भिन्न नहीं होता था। मैं कभी कभी पसोपेश में भी पड़ा लेकिन अन्त में यही निकलकर आता था कि खुद ही समझ लो, क्या वैसा सोचने में भी शान्ति है? कमोबेश ऐसा पसोपेश सभी युवाओं के मन में ऐसे तर्क सुनकर उत्पन्न होता है। लेकिन हम आपको बता दें कि ऐसे तर्क करने वाले प्रायः धर्मग्रन्थों का केवल सतही ज्ञान ले करके आये होते हैं।

लेकिन हम आपके हित के लिए बता दें कि श्रीमद् भागवत पुराण जो कि भारतीय धर्म और संस्कृति का विश्वकोश कहा जाता है, में ब्रह्मचर्य का बड़ा स्पष्ट प्रतिपादन है वहाँ एक श्लोक आता है-


 रेतो नावकिरेज्जातु ब्रह्मव्रतधरः स्वयम्।
 अवकीर्णेऽवगाह्याप्सु यतासुस्त्रिपदां जपेत् ॥

  - श्रीमद् भागवत पुराण 11 वाँ स्कन्ध, 17 वाँ अध्याय, 25 वाँ श्लोक

अर्थ - ब्रह्मचर्य व्रत धारे हुए व्यक्ति को चाहिये कि अपना वीर्य (रेतस्)  स्वयं कभी भी न गँवाए। और यदि वीर्य कभी (अपने आप) बाहर आ ही जाये तो ब्रह्मचर्य व्रतधारी को चाहिये कि वह पानी में अवगाहन करे (यानी नहाये) और थोड़ा प्राणायाम करके गायत्री मन्त्र का जाप करे।

(इसका सन्धि विच्छेद करके शब्द इस प्रकार हैं-

 रेतो न अवकिरेत् जातु, ब्रह्मव्रतधरः स्वयम्।
अवकीर्णे अवगाह्य अप्सु यतासुः त्रिपदां जपेत्॥)

यहाँ कुछ भी द्विअर्थी नहीं, यानी समूची व्याख्या सरल है। रेतस् का अर्थ वीर्य ही होता है। ब्रह्मव्रत यानी ब्रह्मचर्य व्रत (यह ब्रह्मचर्य का एक और गौरवपूर्ण नाम है)। इस एक छोटे से श्लोक ने मुझे बहुत सारी शिक्षाएँ दी हैं। पहली बात तो यह है कि यह ब्रह्मचर्य के नाम पर खौफ़ नहीं पैदा करता। बल्कि सत्य को सत्य की तरह रखता है। यह कहता है कि ब्रह्मचर्य व्रती को स्वयं रेतस् का नाश नहीं करना चाहिये। यानी कि यहाँ व्यक्ति की खुद की नीयत ज्यादा महत्त्वपूर्ण है। और फिर यह, स्वतः वीर्यस्राव को यह हौवे की तरह नहीं रखता, साथ ही, उसका भी प्रतिकार बताता है- कि यदि स्वतः वीर्यस्राव हो जाये तो जल से नहाकर, प्राणायाम करके गायत्री जाप करें। भक्ति के विश्वकोश में यह एक ज्ञान (या विज्ञान) की बात आयी है। नहा लेने से स्वतः स्राव से उत्पन्न होने वाली अपवित्रता कुछ हद तक दूर हो जाती है (ध्यान दें कि स्वतः वीर्यस्राव को भी न होने देने का हमारा प्रयास रहना चाहिये, इसके लिए भी विचार व्यवहार का सुधार करना होता है)। नहाने के बाद प्राणायाम किये जाने से मन की एकाग्रता पुनः सात्त्विक दिशा में मोड़ने में भारी मदद मिलती है (यह परिणाम तुरन्त होता है)। और गायत्री मन्त्र तो ब्रह्मचर्य की विख्यात टेक है ही। इस प्रकार हम देखते हैं कि श्लोक में ब्रह्मचर्य का अर्थ तो साफ बताया ही है, ब्रह्मचर्य में सहायक तीन तकनीकें भी बोनस के रूप में बता दी गयी हैं (स्नान, प्राणायाम और गायत्री मंत्र का बार-बार उच्चारण)।

इसका मतलब यह हुआ कि प्राचीन भारत में जब श्रीमद् भागवत के सुनने-सुनाने की परंपरा रही होगी, तब लोग ब्रह्मचर्य की अवधारणा को ऐसे श्लोकों के माध्यम से साफ़-साफ़ एक-दूसरे तक और पीढ़ी-दर-पीढ़ी कम्यूनिकेट करते होंगे। आज की तरह नहीं कि ब्रह्मचर्य की बात में शर्म और बाकी बातों में लज्जाहीनता। और यह सर्वमान्य है कि पुराणों का प्रचलन जनसाधारण में काफ़ी था इसलिए लगता है कि ब्रह्मचर्य की अवधारणा को जन-जन तक पहुँचाना प्राचीन तत्त्वद्रष्टाओं की दृष्टि में था। आशा है इस एक श्लोक ने हमारे युवावर्ग के मन में उठने वाले एक प्रमुख सन्देह का निराकरण किया होगा। 

इति शुभम्॥